अक्साई चिन में चीन द्वारा किए गए प्रशासनिक परिवर्तन भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौतियां खड़ी करते हैं

02 September 2026  |  

Devendra Kumar, Jabin T. Jacob
Geopolitics
Borders and Identity

26 मार्च को चीन की राज्य परिषद ने शिनजियांग में एक नए काउंटी (चीनी राजनीतिक-प्रशासनिक प्रणाली में जिला-स्तरीय प्रशासनिक इकाई के समकक्ष) के गठन की घोषणा की, जिसका नाम सेनलिंग रखा गया है। इसका गठन काशगर प्रान्त के अंतर्गत अक्साई चिन के पश्चिमी भाग में स्थित कारगिलिक काउंटी (चीनी भाषा में येचेंग काउंटी) के प्रशासनिक पुनर्गठन का परिणाम है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने मीडिया के सवालों का जवाब देने से पहले दो सप्ताह से अधिक का इंतजार किया और कहा कि वह "चीन द्वारा भारत की भूमि के हिस्से वाले स्थानों को काल्पनिक नाम देने के किसी भी शरारती प्रयास को स्पष्ट रूप से खारिज करता है।" नई दिल्ली का आधिकारिक बयान शायद जनवरी 2025 में दिए गए उसके जवाब से थोड़ा अधिक कड़े शब्दों में था, जब दिसंबर 2024 में अक्साई चिन के पूर्वी हिस्से में स्थित होतान प्रान्त में दो नए काउंटी , हेआन और हेकांग, बनाए गए थे।

विदेश मंत्रालय की इस तरह की विलंबित और संक्षिप्त प्रतिक्रियाओं से इस तथ्य को छिपाया नहीं जा सकता कि हाल के वर्षों में अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन द्वारा किए गए प्रशासनिक परिवर्तन और अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम परिवर्तन का भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जहां चीन द्वारा स्थानों के नाम परिवर्तन का उद्देश्य भारतीय क्षेत्र पर अपना दावा जताना है, वहीं नई प्रशासनिक इकाइयों का निर्माण या उनकी स्थिति और श्रेणी में परिवर्तन का उद्देश्य, अन्य बातों के अलावा, इस क्षेत्र में खानाबदोश आबादी और चीन के आंतरिक प्रांतों से आए हान जनजाति के लोगों के स्थायी बसने को सुगम बनाना है।

2020 में भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) पर बल प्रयोग करने की उसकी तत्परता के साथ-साथ, ये नाममात्र के प्रशासनिक उपाय भारत के साथ सीमा विवाद पर चीन के निरंतर ध्यान और अपने पक्ष में स्थिति को रचनात्मक रूप से आकार देने के उसके प्रयासों को उजागर करते हैं।

चीन के उद्देश्य

सेनलिंग काउंटी के गठन की औपचारिक घोषणा नए काउंटी मुख्यालय शिन्हुआ टाउन सहित नए गांवों और कस्बों के निर्माण की एक साल लंबी तैयारियों की परिणति है। 2020 की नवीनतम जनगणना के अनुसार इस नए काउंटी की आबादी लगभग 6,600 है और इसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित है। पिछले एक दशक में, हान आबादी में धीरे-धीरे वृद्धि हुई है, मुख्य रूप से शिनजियांग प्रोडक्शन एंड कंस्ट्रक्शन कोर द्वारा संचालित कृषि फार्मों में, जो एक अर्धसैनिक संगठन और राज्य के स्वामित्व वाला उद्यम है।

दुनिया के अन्य हिस्सों में अपने समकक्षों की तरह चीनी अधिकारी भी विभिन्न कारणों से ग्रामीण प्रशासनिक इकाइयों की प्रशासनिक स्थिति को बदलते हैं और देश भर में नई इकाइयाँ बनाते हैं, जिनमें प्रशासनिक दक्षता में सुधार करना और काउंटी-स्तरीय प्रशासनों को राजस्व और भूमि पर अधिक शक्तियाँ प्रदान करना शामिल है।

हालांकि चीन के प्रशासनिक परिवर्तनों के लिए दीर्घकालिक उद्देश्य कम आबादी वाले, राजनीतिक रूप से अस्थिर क्षेत्रों जैसे कि जातीय अल्पसंख्यक प्रांतों में भिन्न हैं, जहां जनसंख्या वृद्धि और औद्योगीकरण का महत्वपूर्ण स्तर नहीं है।

सेनलिंग और अन्य अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में चीन का तर्क औद्योगीकरण या प्रशासनिक दक्षता को बढ़ावा देना नहीं है। बल्कि इसका एक प्रमुख उद्देश्य राज्य की उपस्थिति का विस्तार करना है। भीतरी प्रांतों से हान जनजाति के पलायन को सुगम बनाकर और खानाबदोश समुदायों को जबरन बसाकर चीनी अधिकारी जातीय अल्पसंख्यक असंतोष को दबाने का प्रयास कर रहे हैं, विशेष रूप से कुनलुन पर्वतमाला के दक्षिण में स्थित क्षेत्रों में, जिनमें अक्साई चिन भी शामिल है, जहाँ उइघुर जातीय अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हैं। तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टी.ए.आर.) के पूर्व में भी इसी प्रकार के उद्देश्य अपनाए जा रहे हैं, जहाँ अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के सामने ल्होका में स्थित त्सोना और सियांग जिले के सामने न्यिंगची में स्थित मेनलिंग- दो ग्रामीण काउंटियों को 2023 में काउंटी शहरों का दर्जा दिया गया था।  

भारत के लिए निहितार्थ

एलएसी के साथ नवगठित प्रशासनिक इकाइयों, जिनमें शियाओकांग चुन - नव-स्थापित या पुनर्जीवित गांव - शामिल हैं, में खानाबदोश आबादी का जबरन बसाव और चीन के अन्य हिस्सों से हान जनजाति के लोगों का आगमन भारत के लिए कई दीर्घकालिक निहितार्थ रखता है।

एक तो खानाबदोश आबादी के जबरन बसने और उन पर चीन के बढ़ते प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण के कारण इन समूहों के लिए पारंपरिक रीति-रिवाजों, संस्कृति और भाषा को बनाए रखना और भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा पूर्वी क्षेत्र में एल.ए.सी. के दोनों ओर कुछ जातीय समूहों के बीच मौजूद सीमित सीमा-पार सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध भी बनाए रखना लगभग असंभव हो जाता है।

दूसरा, सीमावर्ती क्षेत्रों के निकट रहने वाली वफादार हान आबादी की बढ़ती संख्या पी.एल.ए. की बड़ी उपस्थिति को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकती है।

तीसरा, चीनी बस्तियाँ जितनी अधिक एल.ए.सी. के करीब पहुँचेंगी, भारत के साथ सीमा विवाद के किसी भी समाधान के लिए आवश्यक बड़े क्षेत्रीय रियायतों को स्वीकार करने की उनकी संभावना उतनी ही कम होगी। उदाहरण के लिए, टी.ए.आर. में त्सोना काउंटी की नई काउंटी सीट को त्सोना टाउन से मामा मोनपा टाउन में स्थानांतरित करना, जो कि दूर है और जिसकी आबादी केवल 167 लोग है, लेकिन तवांग के सामने एलएसी के करीब है, यह दर्शाता है कि तवांग अब अधिक बुनियादी ढांचा विकास का लक्ष्य बनेगा और संभवतः एक बड़े शहरी केंद्र के रूप में विकसित होगा।

चौथा, चीन द्वारा अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में किए जा रहे शहरीकरण के प्रयास पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक विकास और उससे जुड़े अवसरों को बढ़ावा देने के लिए भी तैयार किए गए हैं। हालांकि भारत द्वारा ऐसे संबंधों का विरोध किए जाने की संभावना है, लेकिन चीन के अन्य पड़ोसी देश इनके प्रति अधिक खुले हो सकते हैं। चुनौतियों के बावजूद अक्साई चिन के रास्ते दक्षिणी शिनजियांग के शहरीकरण का प्रयास पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र तक एक वाणिज्यिक गलियारे को बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

कुल मिलाकर ये चीन द्वारा अपने सामाजिक स्थिरता उद्देश्यों को अपने क्षेत्रीय दावों को सुदृढ़ करने और व्यापक विदेश नीति उद्देश्यों को बढ़ावा देने के साथ एकीकृत करने के दीर्घकालिक प्रयास हैं। जहाँ एक ओर भारतीय सरकार ने चीन द्वारा विकसित शियाओकांग गाँवों के जवाब में अपनी 'जीवंत गाँव' योजना शुरू की है, वहीं उसे कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र में चीनी प्रशासनिक परिवर्तनों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर तरीके से देना चाहिए। 2020 में एल.ए.सी. अतिक्रमण की तरह चीन के नवीनतम कदम भारत के साथ द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन करते हैं और नई दिल्ली से स्थानीय प्रशासनिक प्रतिक्रिया के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानूनी और मीडिया प्रतिक्रिया की मांग करते हैं।


This article was originally published in The Tribune as part of an arrangement with the Centre of Excellence for Himalayan Studies

Translated by Pavan Chaurasia