होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) से हिमालय तक: वैश्वीकरण और लद्दाख की पर्यटन अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता

25 August 2026  |  

Fida Hussain Tangrhong
Borders and Identity
Geopolitics
Economy

अपनी उल्लेखनीय आत्मकथा, ‘तिब्बती कारवां’  में लद्दाखी कारवां नेता और लेखक अब्दुल वाहिद राधू ने चांगथांग पठार से ल्हासा की ओर अपनी यात्रा का एक जीवंत दृश्य वर्णित किया है। चांगपा खानाबदोशों के साथ अपनी मुलाकात के बारे में लिखते हुए वे कहते हैं:

“उनमें से लगभग सभी भेड़ की खाल के कपड़े पहनते हैं। वे मांस, मक्खन वाली चाय और कभी-कभी त्सम्पा (एक प्रकार का सूप) खाकर जीते हैं। रोटी तो उनके लिए अनजान सी लगती है। वे अद्भुत चरवाहे हैं, जो सबसे ऊँची चोटियों पर चढ़ने में सक्षम हैं… जब मैं उन्हें देख रहा था, तब कुछ लड़के और छोटी लड़कियाँ, मासूमियत की मूर्ति के रूप में बड़ी चट्टानों के आसपास कंकड़ों से खेल रहे थे, बाहरी दुनिया से बेखबर, सिवाय उस ठंडी हवा के जो उन्हें झकझोर रही थी। उन्हें कैसे पता चलता है कि कहीं और, उन देशों में युद्ध छिड़ गया है जिन्हें सभ्य कहा जाता है?”

राधू ने ये पंक्तियाँ 1942 में लिखी थीं, जब यूरोप द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही में डूबा हुआ था। सभी महाद्वीप जल रहे थे, शहर बमबारी का शिकार हो रहे थे और लाखों लोगों की जान जा रही थी। फिर भी लद्दाख के सुदूर पहाड़ी इलाकों और तिब्बती पठार में जीवन शांतिपूर्वक चलता रहा था। खानाबदोश बच्चे हजारों किलोमीटर दूर घट रही तबाही से बेखबर चट्टानों और चारागाहों के बीच खेलते रहे थे।

राधू का अवलोकन मात्र एक यात्रा वृत्तांत से कहीं अधिक था। यह आधुनिक सभ्यता की एक सूक्ष्म आलोचना भी थी। वो क्षेत्र जो स्वयं को गर्व से "सभ्य" कहते थे, मानव इतिहास के कुछ सबसे विनाशकारी युद्धों का कारण बन रहे थे, जबकि कठोर वातावरण में रहने वाले चरवाहा समुदाय अपनी ही दुनिया में डूबे रहते थे, दूर के संघर्षों से लगभग अछूते। राधू की मुलाक़ात चांगपा खानाबदोशों से हुई, जो पृथ्वी पर सबसे कठिन जीवन शैली जीते थे, अपने झुंडों के साथ हवा से भरे पठारों पर घूमते रहते थे। फिर भी, अपने वातावरण की कठोरता के बावजूद, उनका जीवन प्रकृति और समुदाय से गहराई से जुड़ा हुआ था। दूर के महाद्वीपों के युद्धों का उनके चरागाहों या उनकी दैनिक दिनचर्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भूगोल और अलगाव ने उन्हें एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान की।

राधू द्वारा वर्णित दुनिया अब मौजूद नहीं है। कभी अलग-थलग पड़ा हिमालयी क्षेत्र लद्दाख आज वैश्विक आर्थिक नेटवर्क से गहराई से जुड़ा हुआ है। पर्यटन, विमानन, ऊर्जा बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाएं अब इस दूरस्थ भूभाग को हजारों किलोमीटर दूर घटित हो रही घटनाओं से जोड़ती हैं। विडंबना यह है कि वैश्वीकरण की जिन प्रक्रियाओं से इस क्षेत्र में समृद्धि आई है, उन्हीं ने इसे दूरस्थ संकटों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील बना दिया है।

हालांकि भौगोलिक रूप से हिमालय से दूर होने के बावजूद ईरान, इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ना शुरू हो गया है। दुनिया की अधिकांश तेल आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है, जिससे यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में से एक बन जाता है। इस संकरे समुद्री गलियारे में किसी भी प्रकार की अस्थिरता से वैश्विक बाजारों में ईंधन की कीमतें तुरंत बढ़ जाती हैं।

लद्दाख जैसे पर्यटन पर निर्भर क्षेत्र के लिए इसके परिणाम लगभग तुरंत ही महसूस होने लगते हैं। ईंधन की बढ़ती कीमतों से हवाई किराए और परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिससे दूरदराज के गंतव्यों की यात्रा काफी महंगी हो जाती है। वैश्विक मानकों के अनुसार, विमानन ईंधन की औसत कीमत हाल ही में बढ़कर 173.91 डॉलर प्रति बैरल हो गई है, जो इस वर्ष की शुरुआत में दर्ज किए गए स्तरों से लगभग दोगुनी है। विमान कंपनियों ने भी ने इन बढ़ती लागतों के अनुरूप ढलना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, एअर इंडिया ने 12 मार्च से शुरू होने वाली उड़ानों पर ईंधन अधिभार लागू करने की घोषणा की है।

लद्दाख के पर्यटन उद्योग के लिए ये घटनाक्रम एक बेहद संवेदनशील समय पर सामने आए हैं। क्षेत्र में पर्यटन का मौसम अभी शुरू होना बाकी है। हर साल लद्दाख अप्रैल में धीरे-धीरे पर्यटकों के लिए अपने द्वार खोलता है, जब निचली सिंधु घाटी के गांवों में वसंत के पहले संकेत दिखाई देने लगते हैं। खुबानी फूल महोत्सव, जो इस वर्ष 8 अप्रैल से शुरू होने वाला है, पर्यटन मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। कारगिल में स्थित गरकोन, दाह-बेमा और कर्कित्चू जैसे लद्दाख के प्रसिद्ध खुबानी उत्पादक क्षेत्रों के गांव, साथ ही लेह में स्थित स्कुरबुचन, तकमाचिक और तुरतुक, खुबानी के बागों के संक्षिप्त लेकिन शानदार खिलने के दृश्य को देखने के लिए आगंतुकों का स्वागत करते हैं। कई स्थानीय पर्यटन संचालकों के लिए यह मौसमी आयोजन वसंत ऋतु की शुरुआत के यात्रा कार्यक्रमों का मुख्य केंद्र होता है, जिन्हें सावधानीपूर्वक तैयार और प्रचारित किया जाता है।

हालांकि पर्यटकों के आगमन से कुछ सप्ताह पहले ही पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों में चिंता फैलने लगी है। होटल मालिक और स्थानीय पर्यटन संचालक वैश्विक स्थिति पर गहरी नज़र रख रहे हैं और चिंतित हैं। लद्दाख की पर्यटन अर्थव्यवस्था अत्यधिक मौसमी है, जो पांच से छह महीनों की छोटी अवधि तक ही सीमित रहती है। सीज़न की शुरुआत में किसी भी प्रकार की बाधा पूरे वर्ष आजीविका को प्रभावित कर सकती है।

ईंधन और खाना पकाने की बढ़ती लागत से दबाव और भी बढ़ रहा है। भारत के विभिन्न शहरों में व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 7 मार्च से लगभग ₹114.5 की वृद्धि हुई है, जिसका सीधा असर लद्दाख के होटलों, रेस्तरां और होमस्टे पर पड़ रहा है। देश के कई हिस्सों से आ रही रिपोर्टों में एलपीजी आपूर्ति में व्यवधान की बात कही जा रही है। बेंगलुरु और चेन्नई के होटल एसोसिएशनों ने चेतावनी दी है कि अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही तो होटल और रेस्तरां को अपना संचालन बंद करना पड़ सकता है। लद्दाख के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि वहां ईंधन और खाना पकाने की गैस सहित अधिकांश आवश्यक वस्तुओं को लंबी और चुनौतीपूर्ण पहाड़ी सड़कों से होकर ले जाना पड़ता है।

इस क्षेत्र के कई लोगों के लिए ये चिंताएँ लद्दाख की पर्यटन अर्थव्यवस्था की कमज़ोरी को उजागर करने वाले पूर्व संकटों की यादें ताज़ा कर देती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान यात्रा अचानक रुक गई थी। उड़ानें निलंबित हो गईं, सीमाएँ बंद हो गईं और लद्दाख का पर्यटन उद्योग लगभग पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। होटल खाली पड़े रहे, टैक्सियाँ बेकार खड़ी रहीं और पर्यटन से होने वाली आय पर निर्भर हजारों परिवार जीवन यापन के लिए संघर्ष करते रहे।

क्षेत्रीय अस्थिरता ने भी पर्यटन क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया है। 2025 की पहलगाम घटना के कारण पूरे हिमालयी क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा 9 नवंबर 2026 को लोकसभा में साझा किए गए आंकड़ों से इसके प्रभाव का पता चलता है । लद्दाख में घरेलू पर्यटकों की संख्या 2024 में 2.92 लाख से घटकर 2025 में 2.12 लाख रह गई, जो लगभग 27.3 प्रतिशत की गिरावट है। कारगिल में स्थिति और भी गंभीर थी, जहां पर्यटकों की संख्या 3.20 लाख से घटकर मात्र 93,389 रह गई, जो लगभग 70.9 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। यह गिरावट पहलगाम हमले और उसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग तीन सप्ताह तक चले सैन्य गतिरोध के कारण हुई, जिसने पूरे क्षेत्र में पर्यटन के उत्साह को काफी हद तक कम कर दिया।

ऐसी घटनाएं एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती हैं। वैश्वीकरण ने निस्संदेह लद्दाख के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। पर्यटन ने आजीविका में सुधार किया है, रोजगार सृजित किया है और इस क्षेत्र को शेष विश्व से जोड़ा है। लेकिन इसने असुरक्षा के नए रूप भी पैदा किए हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध, किसी अन्य महाद्वीप में महामारी या पड़ोसी क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी घटना किसी दूरस्थ हिमालयी समाज की आर्थिक नींव को अचानक अस्थिर कर सकती है।

राधू के समय में चांगथांग की चट्टानों के बीच खेलते हुए जिन बच्चों को उन्होंने देखा, वे दूर महाद्वीपों के युद्धों से अछूते रहे। भौगोलिक स्थिति ने उन्हें बाहरी दुनिया की अराजकता से बचाए रखा था। आज वह सुरक्षात्मक दूरी समाप्त हो गई है। और यह विडंबना स्पष्ट है। लद्दाख से भौगोलिक रूप से दूर होने के बावजूद एक युद्ध वसंत के पहले फूल खिलने से हफ़्तों पहले ही वहाँ के गाँवों में चिंता पैदा कर सकता है। 21वीं सदी की परस्पर जुड़ी दुनिया में पहाड़ अब समुदायों को वैश्विक झटकों से बचा नहीं पाते।

लेखक के बारे में: फिदा हुसैन तंगरहॉन्ग ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से आंतरिक एशियाई अध्ययन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उनका शोध लद्दाख पर पश्चिमी यात्रा वृत्तांतों के उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन पर केंद्रित है। इससे पहले वे दिल्ली-एनसीआर स्थित शिव नादर इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर हिमालयन स्टडीज में अनिवासी एसोसिएट फेलो के रूप में कार्यरत थे। वे लद्दाख स्थित स्थानीय यात्रा कंपनी लद्दाख बैकपैकर्स के सह-संस्थापक और निदेशक भी हैं।


Originally Published in English as Fida Hussain Tangrhong. 2026. ‘From the Strait of Hormuz to the Himalayas: Globalisation and the Vulnerability of Ladakh’s Tourism Economy’. Commentary. Centre for Excellence for Himalayan Studies. 16 March.

Translated by Pavan Chaurasia