चीन से निपटने की रणनीति: एल.ए.सी. विवाद सुलझाने से पहले व्यापार और कैलाश यात्रा ही भारत की पहली पहल क्यों हों

29 August 2026  |  

Claude Arpi
Borders and Identity
Economy
Geopolitics

भारत-चीन संबंधों को फिर से बेहतर बनाने का एक पहला सरल कदम यह हो सकता है कि सदियों पुरानी परंपरा का पालन करते हुए सीमाओं को 1950 के दशक की तरह फिर से खोल दिया जाए, विशेष रूप से व्यापार और कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा के लिए.

ऐसी अफवाहें चल रही हैं कि दिल्ली और बीजिंग वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल, एल.ए.सी.) पर विवाद सुलझाना चाहते हैं; हालांकि, यह कहना तो आसान है, पर इसे करना मुश्किल है। पहली बात तो यह है कि भारत और चीन के बीच कई 'समझौते' मौजूद हैं जिनमें एल.ए.सी. का जिक्र तो है, लेकिन इसे कभी परिभाषित या मानचित्र पर सीमांकित नहीं किया गया है। इसलिए इन समझौतों का क्या होगा, यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पहले निर्णय लेना आवश्यक होगा। एल.ए.सी. को सुलझाने का मतलब विभिन्न धारणाओं (मानचित्र पर या जमीनी स्तर पर) को स्पष्ट करना और विवादित दावों का समाधान ढूंढना भी है।

उदाहरण के लिए, लद्दाख को लेकर ऐसा कहा जाता है कि वहां बारह ऐसे स्थान हैं जहाँ दो एशियाई महाशक्तियों की धारणाएँ भिन्न हैं। यह कार्य आसान नहीं है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सहित पूर्वी क्षेत्र के मानचित्र पर चीनी 'धारणाओं' को कभी दर्शाया ही नहीं गया है।

उत्तरी क्षेत्र के संदर्भ में 2002 में दोनों पक्षों के बीच 20 मिनट के लिए नक्शों का आदान-प्रदान हुआ और फिर दोनों पक्षों ने उन्हें वापस ले लिया। अन्य मुद्दों के अलावा चीन ने भारतीय नक्शों में गिलगित बाल्टिस्तान को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई थी।

पहला और आसान कदम यह हो सकता है कि सीमा/एलएसी को 1950 के दशक की तरह ही फिर से खोल दिया जाए, विशेष रूप से व्यापार और कैलाश-मानसरोवर की तीर्थयात्रा के लिए, जैसा कि यह सदियों से मौजूद था।

शिपकी-ला को पुनः खोलना

चीन ने हाल ही में जून 2026 में शिपकी-ला मार्ग को फिर से खोलने पर सहमति जताई है; हिमाचल प्रदेश सरकार इसे व्यापार और पर्यटन के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन मानती है। कोविड-19 प्रतिबंधों के चलते 2020 में यह व्यापार मार्ग बंद कर दिया गया था। 2024 में नेतृत्व स्तर की वार्ता के बाद भारत-चीन संबंधों को नए सिरे से शुरू करने के प्रयास में दोनों देशों ने उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथू-ला सहित अन्य मार्गों पर भी व्यापार फिर से शुरू करने पर सहमति व्यक्त की है। लेकिन दर्रों को फिर से खोलना ही पर्याप्त नहीं है।

रोचक रिपोर्टें

भारत-तिब्बत संबंधों पर अपने शोध के दौरान सबसे रोचक अभिलेखीय खोजों में से एक भारतीय व्यापार एजेंटों (इंडियन ट्रेड एजेंट, आई.टी.ए.) की रिपोर्टें थीं, विशेष रूप से पश्चिमी तिब्बत के गार्टोक में तैनात एजेंटों की रिपोर्टें। 1904 में यंगहसबैंड के तिब्बत अभियान और उसी वर्ष जुलाई में ल्हासा कन्वेंशन पर हस्ताक्षर के बाद दुनिया की छत कहे जाने वाले इस क्षेत्र में तीन भारतीय व्यापार बाजार खोले जाने थे: सिक्किम के पास चुंबी घाटी में यातुंग में; ल्हासा के दक्षिण में ग्यान्त्से में; और इससे भी महत्वपूर्ण, पश्चिमी तिब्बत में गार्टोक में। सदियों से उत्तरी भारत और तिब्बत के बीच व्यापार फलता-फूलता रहा। 1951-52 में चीनियों के आगमन के बाद भी लगभग एक दशक तक व्यापार जारी रहा।

ग्यान्त्से स्थित आईटीए के अनुसार वर्ष 1952-53 में "तिब्बतियों और तिब्बत में तैनात बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों के उपभोग के लिए भारत से विभिन्न वस्तुओं की अभूतपूर्व रूप से बड़ी मांग देखी गई"।

चीनी कब्जे के शुरुआती वर्षों के दौरान अधिकांश वस्तुएं भारत से आ रही थीं जिसके परिणामस्वरूप कुछ वर्षों तक व्यापार की मात्रा में वृद्धि हुई। हिमालयी दर्रों से होकर पठार की ओर उत्तर दिशा में जाने वाले अनगिनत कारवां लगातार गुजरते रहे।

विडंबना यह है कि चीन को तिब्बत के लिए चावल का आयात भारत के 'गुप्त द्वार' से करना पड़ा। आईटीए ने टिप्पणी की कि, "अगर उन्हें पूरी छूट होती तो वे डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों, कपड़ों, उपकरणों और अन्य आपूर्ति के मामले में भी ऐसा ही करना पसंद करते।" 1951 और 1954 के बीच, चीनी मुक्ति सेना/लिबरेशन आर्मी (या 'कब्जा करने वाली सेना') के लिए भारत से आपूर्ति प्राप्त करने का सबसे सस्ता और आसान तरीका था।

व्यापार का पतन

हिमालयी आबादी की आजीविका का स्रोत रहा यह व्यापार दलाई लामा के 1959 में अपनी जन्मभूमि से भाग जाने के बाद घटने लगा और 1962 में पूरी तरह से बंद हो गया। गारटोक में भारतीय व्यापार एजेंट के रूप में कार्यरत ए.के. बख्शी ने 20 नवंबर, 1960 को सिक्किम के राजनीतिक अधिकारी को संबोधित अपनी रिपोर्ट में 1960 के व्यापारिक मौसम के दौरान पश्चिमी तिब्बत की स्थिति का वर्णन किया था।

यह दौरा ल्हासा में हुए विद्रोह और उसके बाद दलाई लामा के भारत भाग जाने के एक साल से भी अधिक समय बाद हुआ था। बख्शी को जल्द ही पता चल गया कि पश्चिमी तिब्बत में हालात अच्छे नहीं थे; सीमावर्ती व्यापार में मंदी थी। “1960 के व्यापार सत्र के दौरान अनिश्चित व्यापारिक संभावनाओं के कारण, भारतीय व्यापारी, विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश, पंजाब और लद्दाख के व्यापारी सामान्य संख्या में पश्चिमी तिब्बत नहीं गए। यहां तक कि उत्तर प्रदेश के व्यापारी भी बहुत देर से गए और अपने साथ अपेक्षाकृत कम माल लेकर गए।” मध्य तिब्बत में 1959 की घटनाओं और चीन द्वारा व्यापार की शर्तों को कड़ा करने से भारत और तिब्बत के बीच व्यापार प्रभावित हुआ।

व्यापार एजेंट ने बताया कि “पहले चीनी और उनके तिब्बती कर्मचारी भारतीय दुकानों से खूब खरीदारी करते थे, लेकिन अब उनकी सभी ज़रूरतें चीनी दुकानों से पूरी हो रही हैं, जहाँ कूपन प्रणाली शुरू की गई है। संभवतः निर्देशों के तहत ये लोग अब भारतीय दुकानों में जाने से बचते हैं।”

उन्होंने आगे बताया कि पश्चिमी तिब्बत से निर्यात की जाने वाली तीन मुख्य पारंपरिक वस्तुएँ ऊन, नमक और बोरेक्स थीं, जिन पर धीरे-धीरे चीनियों का कब्ज़ा हो गया। भारतीय व्यापारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक वस्तु ऊन थी, जिस पर चीनियों का लगभग एकाधिकार हो चुका था और उन्होंने इसकी कीमत बढ़ाकर 135 रुपये प्रति मन कर दी थी। चीनियों ने इस वर्ष से मुख्य भूमि (सिंकियांग) को ऊन का निर्यात भी शुरू कर दिया था। चीनी स्पष्ट रूप से पुराने संबंधों को बनाए रखने के इच्छुक नहीं थे।

आईटीए के निष्कर्ष बहुत आशावादी नहीं थे: "व्यापार की संभावनाएं बहुत उज्ज्वल नहीं दिखतीं।"

स्थिति को और भी बदतर बनाने के लिए चीनी बिचौलियों के माध्यम से लगातार प्रयास किए गए, "तिब्बती उत्पादों की कीमतें बढ़ाने और भारतीय वस्तुओं की कीमतें कम करने के लिए, हमारे व्यापारियों और डोकपा लोगों के बीच सीधे वस्तु विनिमय सौदों से इनकार किया गया, जिन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि हमारे व्यापारी सदियों से उनका शोषण करते रहे हैं।" ऐसा प्रतीत होता था कि इस पूरे प्रयास का उद्देश्य धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से तिब्बत से भारतीय व्यापारियों को बाहर निकालना था; बख्शी का मानना था कि जैसे ही चीनी खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेंगे, वे अपनी ऊनी मिलें खोल लेंगे।

कैलाश तीर्थयात्रा का भविष्य

आईटीए की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 1959 के विद्रोह के बाद पश्चिमी तिब्बत में अशांत परिस्थितियों के कारण चीन ने भारतीय तीर्थयात्रियों को कैलाश और मानसरोवर क्षेत्र की यात्रा न करने की सलाह दी थी। परिणामस्वरूप 1960 में केवल 25 तीर्थयात्रियों ने कैलाश और मानसरोवर की यात्रा की; नैनीताल के स्वामी विद्यानंद के नेतृत्व में 13 तीर्थयात्रियों का मुख्य दल उन्ताधुरा दर्रे से होते हुए पश्चिमी तिब्बत में प्रवेश किया और 22 अगस्त को लिपुलेख दर्रे से होते हुए गरब्यांग लौट आया।

हालांकि तीर्थयात्रियों को किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं हुई, “क्योंकि उन्हें परिवहन जैसी किसी भी सुविधा के लिए स्थानीय अधिकारियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा,” फिर भी विश्रामगृहों की समस्या “पहले जैसी ही गंभीर बनी हुई है।” अपनी वापसी यात्रा पर वो लोग आईटीए कैलाश क्षेत्र में रक्षस्तल झील के पास उपलब्ध एकमात्र विश्रामगृह में रुके; उन्होंने पाया कि वह “मानव निवास के लिए अनुपयुक्त था और अस्तबल से भी बदतर दिखता था।” बख्शी ने कहा कि उन्होंने तीर्थयात्रियों से जाना कि “रेडियो और समाचार पत्र ले जाने पर प्रतिबंध था और चीनी सुरक्षा कारणों से कैलाश परिक्रमा के विचार का समर्थन नहीं करते थे।”

जब आईटीए ने गार्टोक स्थित विदेश ब्यूरो को इन कठिनाइयों के बारे में बताया, तो बख्शी को आश्वासन दिया गया कि "पश्चिमी तिब्बत में अशांत परिस्थितियों के संबंध में चीनी सलाह के चलते पिछले दो वर्षों से हमारे तीर्थयात्री पवित्र कैलाश और मानसरोवर की यात्रा नहीं कर पा रहे हैं।" उन्हें बताया गया कि नगारी में स्थिति सामान्य होते ही तीर्थयात्री पवित्र स्थलों की यात्रा फिर से शुरू कर सकेंगे। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।

क्या किया जा सकता है?

हिमाचल प्रदेश में शिपकी-ला और उत्तराखंड में लिपुलेख को 1990 के दशक में आंशिक रूप से फिर से खोला गया था, और नाथू-ला को 2006 में खोला गया था, लेकिन कोविड-19 के कारण 2020 में इन्हें फिर से बंद कर दिया गया। बीजिंग और दिल्ली के लिए विश्वास निर्माण उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेसर, सीबीएम) और पारस्परिक लाभ का विकल्प यह हो सकता है कि व्यापार और तीर्थयात्रा को पहले की तरह फिर से शुरू किया जाए। इसके अलावा कैलाश तीर्थयात्रा के लिए डेमचोक, शिपकी-ला, नीति-ला या माना-ला से होकर आध्यात्मिक मार्ग खोले जाने चाहिए। लाखों भारतीय तीर्थयात्री तिब्बत के पवित्र स्थानों की यात्रा कर पाएंगे; इससे प्राप्त होने वाले अच्छे राजस्व से चीन को कोई आपत्ति नहीं होगी।

आखिर भारत और पाकिस्तान के बीच भी करतारपुर कॉरिडोर को दोनों देशों के बीच की कठिन वास्तविकताओं और कठिनाइयों के बावजूद आपसी सद्भावना के प्रतीक के रूप में खोला गया था। दोनों सरकारों ने गुरु नानक के अंतिम विश्राम स्थल पर जाने वाले तीर्थयात्रियों की सुगम यात्रा सुनिश्चित करने के लिए कॉरिडोर के विकास पर सहमति जताई थी।

उत्तरी सीमा के लिए ये क्षेत्र निश्चित रूप से खोजे जाने योग्य हैं, क्योंकि व्यापार और तीर्थयात्रा ने तिब्बत के साथ भारत के संबंधों में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है; यह वास्तव में हिमालय के दोनों किनारों के बीच एक सेतु का काम कर सकता है और भविष्य में चीन और भारत के बीच एक प्रमुख समझौतावादी रणनीति (सी.बी.एम.) बन सकता है; इसके बाद एल.ए.सी. का समाधान निकल सकता है।


This article was originally published in English as Claude Arpi. 2026. ‘Dealing with China: Why trade and Kailash Yatra should be India’s opening move before LAC settlement’. Firstpost. 13 February.

Translated by Pavan Chaurasia